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BTC में फंसा पेच, एक और सत्र होगा लेटलतीफी का शिकार

लेखक : डॉ० अनिल दीक्षित, आगरा, उत्तर प्रदेश 
Original Supreme Court Copy 
आगराः जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) की कार्यप्रणाली उसके ही गले का फंदा बनने जा रही है। बीटीसी सत्र 2015 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए 22 सितम्बर की जो तारीख तय की थी, उसके करीब बीस दिन बाद डायट फिर छात्र-छात्राओं का आवंटन करने जा रहा है। आश्चर्यजनक ढंग से डीएम को भी गुमराह कर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना, अवमानना के डर में सहमे अफसर
 सुप्रीम कोर्ट ने आठ सितम्बर 2015 को बीटीसी सत्र के नियमितीकरण के लिए आदेश किए थे। बाबा शिवनाथ सिंह शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान बनाम एनसीटीई के केस संख्या 174-2015 में यह व्यवस्था दी थी कि सत्र 2015-16 के लिए सभी प्रवेश प्रक्रिया 22 सितम्बर 2016 तक पूर्ण कर ली जाए ताकि जुलाई 2017 से अगला सत्र शुरू हो सके और अग्रिम सत्र भी नियमित हो जाएं। साथ ही, एनसीटीई और एससीईआरटी को आदेशित किया गया कि वो किसी भी नए संस्थान को मान्यता या संबद्धता प्रदान न की जाए जिसमें सत्र के विलम्बित होने की संभावना हो। लेकिन आगरा डायट ने इन आदेशों की सरासर अवहेलना की। उसके स्तर से काउंसलिंग के पश्चात जो आवंटन पत्र प्रदान किए गए उनमें सुप्रीम कोर्ट के डर में तारीख पिछली डाली। छात्रों ने संस्थानों में प्रवेश के लिए संपर्क किया तो 26 सितम्बर की तिथि व्यतीत हो चुकी थी। इसी बीच डायट से एक गलती और हो गई। तमाम त्रुटियों से भरी प्रक्रिया को उसके स्तर से 27 जुलाई को स्थगित करते हुए 10 अक्टूबर को नई सूचियां जारी करने का आदेश चस्पा कर दिया गया। मामला यहीं फंस रहा है।

Original Supreme Court Copy 
संस्थानों में छात्र-छात्राओं के प्रवेश कर लिये गए हैं। सूचियां स्थगित करने से यह छात्र-छात्राएं हंगामा मचा सकते हैं। संस्थान भी न्यायालय की शरण ले सकते हैं। समस्या ये भी है कि दो लिपिकों के गठजोड़ ने छात्रों से वसूली भी की है। ये छात्र भी सिरदर्द बनेंगे, ये तय है। करीब दो दर्जन छात्रों के ड्राफ्ट गुम कर दिए गए हैं, ये बेचारे प्रतिदिन चक्कर लगाकर लौट जाते हैं। संपर्क किये जाने पर प्राचार्य बीना सत्या इस बात का जवाब नहीं दे पायीं कि 26 सितंबर को तक जो आवंटन पत्र दिए गए उनमें 19 सितंबर से पूर्व की तिथि क्यों डाली गई? बहरहाल, कार्यालय में भय का माहौल है। कोर्ट की अवमानना का खौफ अफसरों को जीने नहीं दे रहा।  

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