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नारी हूँ हारी नहीं


जाने क्यों झूठ "
बोल पाती नहीं....

रंग अनेकों बदल "
पाती नहीं...

बंदिशें जमाने की "
निभा पाती नहीं...

बन गुड़िया मोंम की "
सह पाती नहीं...

जुल्मों-सितम होते "
देख पाती नहीं...

तूफानों के दरिया "
से घबराती नहीं...

रिवाजों की बेड़ियां "
पहन पाती नहीं...

मर्यादाओं को"
लांघ पाती नहीं...

पी के गरल तिरस्कार का"
मौन रह पाती नहीं...

घबरा कर तम से "
लक्ष्य से भटक पाती नही...

बेबस मजलूम "
बन पाती नहीं...

नारी हूं वक्त से"
हार पाती नहीं...

                               रचना सिंह 'रश्मि'
                            कवियित्री साहित्यकार

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