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कविता : ज़िंदगी देख ली हमने...

   
                                                  ज़िंदगी देखली हमने ये रस्मों की कहानी है,
चोट खाए हुये दिल की ये ज़ख्मों की रवानी है,
कोई लव मुस्कुराते हैं कहीं आँखों में पानी है.
नहीं किस्सा ये लैला और मजनू हीर-रांझे का,

ये किस्सा है मेरा यारों ये मेरी ही जवानी है.
गगन में अनगिनत तारे धरा पे जुगनू ये प्यारे,
मौत दीवानों की होती नहीं वो इश्क़ के मारे.
लगाया दिल जिन्होंने जान की परवाह नहीं करके,

इश्क़ में मर गये लेकिन अमर वो हो गये सारे.
हमें मालूम ना था इश्क़ का मजहब नहीं होता,
ये वो दरिया है जिसका कोई भी साहिल नहीं होता.
डूबकर इश्क़ के दरिया में खुद को हम मिटा बैठे,

किसी अनजान राहों में यूँ ठोकर हम तो खा बैठे.
बहुत रोका मगर ना रोक पाये दिल को हम अपने,
तेरी नज़रों से नज़रें दिल से दिल हम तो लगा बैठे.
जुदा किस्मत में होना यूँ लिखा था तुझसे ऐ हमदम,

जुदा तुझसे हुये जब खुद को हम तब ही गँवा बैठे.
याद बनकर चली आई ये नगमा मेरे होठों पर,
दर्द दिल का भरी महफ़िल में हम सबको सुना बैठे.
खुद को हम यूँ गँवा बैठे,खुद को हम यूँ मिटा बैठे...

✍ अमित शर्मा
  
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